Children of government schools will study in regional language and in English medium of non-public, the difference of education will increase further | सरकारी स्कूलों के बच्चे रीजनल लैंग्वेज में पढ़ेंगे और प्राइवेट के इंग्लिश मीडियम में, ऐसे में पढ़ाई का अंतर और बढ़ेगा

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रायपुर11 घंटे पहले

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प्रतीकात्मक फोटो।

केंद्र की नई शिक्षा नीति पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने केंद्र से पूछा है कि रीजनल लैंग्वेज पढ़ाई करवाने वाली नीति क्या निजी स्कूलों में भी लागू होगी? अगर नहीं तो हम सरकारी स्कूल और निजी स्कूल के बीच का भेद कैसे मिटा पाएंगे? हमारे स्कूलों में बच्चे रीजनल लैंग्वेज पढ़ेंगे और निजी स्कूलों में इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई होगी तो पढ़ाई के स्तर का अंतर और बड़ा हो जाएगा। भूपेश ने इस नीति पर एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है जिसमें उन्होंने पूछा है कि लाखों केंद्रीय कर्मचारी ऐसे है जिनका ट्रांसफर देशभर में होता रहता है। छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र, गुजरात, या दक्षिण के राज्य में उसका तबादला होता है तो उसके बच्चे की रीजनल लैंग्वेज की पढ़ाई का क्या हाल होगा। एक साल वह छत्तीसगढ़ी पढ़ेगा और दूसरे साल क्या मराठी में पढ़ाई होगी। उसके बाद क्या गुजराती पढ़ाई जाएगी। प्राचीन भाषा के रुप में आखिर नीति क्या बोलना चाह रही है। संस्कृत और हिंदी को प्राचीन मानेंगे या फिर वे स्थानीय भाषा हल्बी, गोंडी या कन्नड़ को प्राचीन भाषा कहेंगे। आखिर इसका पैमाना क्या होगा?

आंगनबाड़ी को प्राइमरी एजुकेशन से जोड़ने के प्लान पर पुनर्विचार की जरूरत
भूपेश ने सुझाव दिया कि इस मामले में छत्तीसगढ़ का पैटर्न ही सही है जिसमें हम स्थानीय स्तर पर सहायक भाषा के तौर स्थानीय बोलियां पढ़ाते हैं। मुख्य पढ़ाई के लिए हिंदी माध्मम में हिंदी और अंग्रेजी माध्यम में अंग्रेजी मुख्य भाषा होती है। अगर क्षेत्रीय भाषा को मुख्य भाषा के तौर पर अपनाते हैं तो छात्रों की पढ़ाई का बेस ही कमजोर हो जाएगा।
मुख्यमंत्री ने नई नीति में प्राइमरी में आंगनबाड़ी को भी जोड़े जाने पर आपत्ति की है। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी एक कमरे में चलती है। इसमें एक सहायिका और एक कार्यकर्ता होती हैं। इनके भरोसे वहां पर तीन क्लास कैसे लगाएंगे? इस पर विचार ही नहीं किया गया है और उसको प्राइमरी शिक्षा में जोड़ दिया गया है। पहले इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव करने की जरूरत है तभी कोई सफलता मिलेगी। अन्यथा यह बदलाव व्यावहारिक नहीं है। आंगनबाड़ी को प्राइमरी एजुकेशन से जोड़ने के प्लान पर पुनर्विचार करना चाहिए।
शिक्षकों के लिए बीएड जैसी अनिवार्यता निजी क्षेत्र में कितने प्रभावशाली ढंग से लागू की जाएगी, इसका उल्लेख नई नीति में आवश्यक है। ये बंदिशें केवल सरकारी स्कूलों के लिए होकर रह जाती हैं।
भूपेश ने कहा-अभी कोरोना का संकट चल रहा है और इस पर कुछ नहीं कहा गया है। आखिर क्लासेस लगेंगी तो कैसे लगेंगी। कोरोना संकट जैसी परिस्थिति में किस प्रकार पढ़ाई होगी। केंद्र सरकार कह रही है कि जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। अभी तो जीडीपी 2.eight प्रतिशत पर चली गई है। किस प्रकार की व्यवस्था एजुकेशन के लिए की जाएगी। यह भी स्पष्ट करना चाहिए था।

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