OPINION: चेतावनी को नजरअंदाज करने का नतीजा है कोरोना संकट, ले सकते हैं ये सबक, | rest-of-world – News in Hindi

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OPINION: चेतावनी को नजरअंदाज करने का नतीजा है कोरोना संकट, ले सकते हैं ये सबक

मध्य प्रदेश में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ा है.

बिल गेट्स ने 2015 में चेताया था कि दुनिया सूक्ष्मजीवों के खतरे को अनदेखा कर रही है, जिससे लाखों लोग मारे जा सकते हैं.

लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) पीसी कटोच

16 जनवरी को व्हाइट हाउस ने कोविड-19 (Covid-19) को लेकर सबसे खराब अनुमान जारी किया. कहा गया कि कोरोना वायरस (Coronavirus) से 15 से 22 लाख अमेरिकी मारे जा सकते हैं. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय ने 31 जनवरी को संशोधित अनुमान जारी किया. इस बार 1.99 से 2.40 लाख लोगों के मारे जाने की आशंका जताई गई. दोनों ही बार व्हाइट हाउस ने यह नहीं बताया कि अनुमान के लिए किस मॉडल का प्रयोग किया गया. लेकिन इसने एक अनिश्चितता का संकेत तो दे ही दिया. सबने देखा कि दुनिया ने एक ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसने मौत और हताशा देखी. साथ ही मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी देखी गई. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इसके बाद बड़बोलापन भी दिखाया और दवा मांगते हुए भारत को बदले की चेतावनी भी दे डाली. हालांकि, इसके बाद रणनीतिक साझेदारी भी देखने को मिली और ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की.

कोविड-19 (COVID-19) से पहले भी कई महामारियों ने दुनिया में तबाही मचाई है. वैश्विक स्तर पर इस बार अराजकता इसलिए भी अधिक है क्योंकि पहले के अनुभव से नहीं सीखा गया और चेतावनी को नजरअंदाज किया गया. बिल गेट्स ने 2015 में टेड टॉक्स पर चेतावनी दी थी कि इस समय दुनिया का ध्यान परमाणु और इसके निवारण कार्यक्रमों पर केंद्रित है. लेकिन  ऐसा करते समय सूक्ष्मजीवों के खतरे को अनदेखा किया जा रहा है, जिससे लाखों लोग मारे जा सकते हैं.

इससे पहले व्हाइट हाउस कोरोना वायरस टास्क फोर्स के सदस्य एंथनी फौसी ने भी दुनिया को चेताया था. उन्होंने 2017 में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों और ‘ट्रंप के कार्यकाल के दौरान’ एक खतरे की चेतावनी दी थी. उन्होंने इससे बचाव के लिए ग्लोबल हेल्थ सर्विलांस सिस्टम, पब्लिक हेल्थ-कम-हेल्थ-केयर इंन्फ्रास्ट्रक्चर, पारदर्शिता और सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया था. एंथनी ने टीकों के लिए रिसर्च के लिए भी साथ आने की अपील की थी. उन्होंने महामारी की वैश्विक प्रकृति को देखते हुए इन उपायों की अनदेखी ना करने की चेतावनी भी दी थी.COVID -19 को लेकर अलग-अलग देशों की प्रतिक्रिया हैरानी भरी रही है. इसमें चीन की अस्पष्टता और अपारदर्शिता की भूमिका भी रही. जनवरी में ट्रंप के आर्थिक सलाहकार पीटर नवारो ने कहा कि कोरोना वायरस से 10 लाख अमेरिकी मारे जा सकते हैं. फिर फरवरी में नवारो ने 20 लाख मौतों की चेतावनी दी.

COVID-19 के खिलाफ भारत की लड़ाई तब तक अच्छी थी, जब तक कि निजामुद्दीन में सभा करने वाली तबलीगी जमात के लोगों के संक्रमण का पता नहीं था. बाद में इन लोगों के साथ यह वायरस देश के अन्य हिस्सों में तेजी से फैला. दिल्ली सरकार ने 13 मार्च को ऐलान किया कि 50 से अधिक लोगों के किसी भी कार्यक्रम को मंजूरी नहीं दी जाएगी. फिर 16 मार्च को यही बात दोहराई गई. 18 मार्च को धारा 144 लागू कर दी गई. यह समझ से परे है कि इसके बावजूद एक हजार से अधिक लोगों की एक सभा निजादुद्दीन में कैसे जारी रही.

लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के मामले में भी कई राज्यों में कुप्रबंधन देखने को मिला. हालांकि केंद्र ने इसे बाद में कुछ हद तक सुलझा लिया. कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कुछ नेताओं की अगुआई में ऐसे कार्यक्रम देखने को मिले, जिनमें सोशल डिस्टिेंसिंग को प्रभावित किया. मोदी के आह्वान और लॉकडाउन के बावजूद यह सब देखना निराशाजनक है. यकीनन, यह सब करके हम महामारी से नहीं लड़ सकते हैं. हमने 2006 में बर्ड फ्लू और 2009 में स्वाइन फ्लू को मात दी है. कोरोना से जीतने के लिए हमें अनुशासित तो होना ही पड़ेगा.

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(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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First revealed: April 9, 2020, 4:07 PM IST



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